parth misra

Thursday, 13 May 2010

मित्र मनसा आनंद प्राप्ति का पर्व

Krishna Gopal धर्म स्वभाव है, तो फिर स्वभाव क्या है ? अपने ही स्वभाव को समझने की विधि यदि आ गयी तो द्वन्द ही समाप्त हो जाता है. आग का स्वभाव स्थिर है, इसलिए वह खाना पकाने,और प्रकाश और विद्युत् ऊर्जा बन कर उपयोगी है, किन्तु विनाशकारी भी है. जल के संपर्क में, वह स्थिर भी नहीं रह सकता. उसका स्वभाव, फल से बिमुख है, और इन कारणों से बदल भी नहीं सकता. गाँधी, तुलसीदास, बुद्ध, गुरु नानक, कबीर अपना स्वभाव नहीं त्याग सकते, इसी लिए ही उन्हें वीर भी कहते हैं.

भगवत गीता में स्वभाव, दो शब्द की संधि है. स्व और भाव. भाव का अर्थ है, लेन देन जिसमें, हर क्रिया की एक निश्चित प्रतिक्रिया होती है. जबकि स्व, सिर्फ क्रिया करता है, जो प्रतिक्रिया नहीं है. स्वभाव में स्व का बढ़ना और भाव का कम होना, मोक्ष की दिशा है, और स्व का घटना और भाव का बढ़ना, मनुष्य को मशीन बना देती है.

मनसा आनंद, एक सज्जन से दिखने वाले व्यक्ति लगे, जो धर्म शब्द के अर्थ और उसकी खोज में रूचि रखते है. उनको मेरा प्यार. ओशो का चरित्र स्वाभाविक चिंतन में लगे हुए हर व्यक्ति का चरित्र है. ओशो एक अवस्था है.खोज के मार्ग का एक पड़ाव. भला अपने को खोजने की क्या जरूरत ? यह जरूरत इसलिए है, कि दुनिया के रंग मंच में काम करते बहुत जीवन बीत गया, और लोग अब हमें रोल से ही पहिचान पाते हैं, और मैं खुद भी अपना परिचय भूल गया हूँ.


Mansa Anand प्रिय मिश्रा जी,
जीवन में जो भी आप करते है या होता है, एक मशिन के समान सारी क्रियाये है। जब तक आप में तमस है,निन्‍द है, बेहोशी है, मनुष्‍य कैसे कह सकता है वो है। तब उसे अपने होने का पता नहीं फिर स्‍वाभाव कि बात नीरी बेईमानी यो कोरी दिमागी खुजली नहीं है। आप रात को सो जाते हो अपना पता है। नहीं ओर मजे दार बात जो आदमी पूर्ण जाग जाता हैउसे कभी जम्‍हाई ही नहीं आती। उसके अंदर कुछ ऐसा नहीं है जो वो नहीं जानता। क्‍या अग्‍नि अपने स्‍वाभाव तक पहुंचे अग्‍नि कहलाएगी। फिर कोन कहे गा उसे अग्‍नि। ज्ञान बोद्धिक वस्‍तु नहीं है वरना तो नानक,कबीर, बुल्‍लेशा......जैसे उसे नहीं पा सकते थे।


Krishna Gopal किसी बात को जब यदि बुद्धि नहीं समझ सकती, तो मन उस पर विश्वास किस तरह कर सकता है? संसार के कार्य बुद्धि के द्वारा ही उसके पूर्व सन्दर्भ से ही पारिभाषित होते हैं. अर्थात, बुद्धि और स्मृति और अनुभव, संसार के प्रयोग द्वारा ही ज्ञान प्राप्त करते हैं, जिस पर मन विश्वास या अविश्वास करता है. निरंतर खोज की यह विधि ही ज्ञान है. इस ज्ञान में त्रुटि का कारण... है, दृष्टिकोण में व्यापकता की कमी या, पूर्वाग्रह या मान्यताएं.

आजकल, पढ़े-लिखे भारतीय लोग भी श्रीमति और श्रीमन को लिंग सूचक शब्द मानते है. पुरुष और नारी को भी लिंग से जोड़ कर देखते हैं. इस पर मुझे आश्चर्य हुआ, जब भगवत गीता ने मेरी आँख खोली. मति अर्थात बुद्धि का श्री या श्रेष्ठ होना ही श्रीमति है. और मन का श्री होना ही श्री मन है. बुद्धि, सांसारिक कई, इसलिए वह इन्द्रियों और स्मृति और अहंकार से जीवन यात्रा चलाती है. और मन, जो मौन है, और अपने लक्ष्य को जानता है, और बुद्धि से अपेक्षा करता है, कि उसे गंतव्य पर ले चले, जीव के अन्दर ही मन और बुद्धि दोनों ही होते हैं. यदि बुद्धि व्यभिचारिणी हो जाय, और मन के विरुद्ध हो जाय, तो आनंद जाता रहता है. ज्यादातर, मनुष्य जो मन का भौतिक रूप या प्रतीक है, उसकी बुद्धि हर ली जाती है, और मन का आनंद जाता रहता है. मन ही वह पुराना पुरुष है, जिसे श्री कृष्ण "पुरुषः पुराणं" कहते हैं. अर्थात मन तो पुराना है, जिसकी बार बार जन्म और मित्यु होती है, किन्तु मोक्ष नहीं. और बुद्धि/ मति हर जन्म में नयी मिलती है.

जो भी व्यक्ति बुद्धि द्वारा किसी भी छोटे से छोटे कारण और उसके प्रभाव के चक्र जिसे साइंस भी कहते हैं, को जानता है, वह सम्पूर्ण विश्व के नियम को जान सकता है. इस तरह उसके दृष्टिकोण की व्यापकता, उसके स्वभाव या उसके मन की दृढ़ता होने लगती है. मुझे गाँधी, और आइन्स्त्ताइन या कबीर के प्रयोग और उनके शब्दों को समझना आसान लगा. उनका जीवन एक प्रवचन कर्ता, या पारंपरिक साधू या पंडित का वेश न होने पर भी बोलता है. अपने आप को समझाना और संतुष्ट करना सरल नहीं है, उसे दूसरे महात्माओं की कहानी सुना कर, सुलाया जा सकता है, किन्तु वह संतुष्टि या मोक्ष नहीं. व्यक्ति को स्वयं ही वह बनना ही पड़ेगा.
आप के जीवन के लिए मेरा प्यार और, लोगों को प्रेरणा देते रहें, सत्कर्म का यह अभ्यास, आगे का रास्ता दिखता ही रहेगा.

Mansa Anand ज्ञान अगर मन ओर बुद्धि की पकड़ के अंदर आ जाए तो वह ज्ञान बहुत छोटा रहा, आपने कहां निरंतर खोज की विधि हीं ज्ञान है, किस की खोज करनी हे। आप इस मन ओर बुद्धि की कितनी सीमा समझते है। क्‍या ये छोटी से छोटी वस्‍तु की भी परिभाषा कर सकती है। आप पुरा जीवन इस इस मन ओर बुद्धि के द्वारा ''रोटी'' जैसी आम जिसे हम रोज देनिक जीवन में प्रयोग करते है। मुझे बता सकते ह...

Krishna Gopal आप ने पूछने की कृपा की, तो आप में स्थिर श्री कृष्ण को, उनके ही एक शिष्य की तरह जवाब देना चाहता हूँ. ज्ञान खोज की विधि है, और खोज के मार्ग उसके मार्ग की चौड़ाई को निरंतर सीमित करते हैं. अर्थात ज्ञान, खोज के साथ निरंतर कम ही होता रहता है, क्योंकि उसकी पवित्रता बढती है. यह उसी तरह है, जैसे सोने के धूल का एक पर्वत लेने के बजाय एक किलो शुद्ध सोना अधिक उपयोगी है.

ज्ञान प्रारंभ में, रक्षा, फिर व्यवसाय, फिर कर्म, फिर अध्यात्म और फिर आत्म तत्त्व अर्थात ब्रह्म में, अपने आप को जानने की एक यात्रा है. स्वभाव के परिवर्तन ज्ञान द्वारा ही हो सकते हैं. जब एक व्यक्ति, किसी विद्यालय या गुरु से प्रेरणा पा कर, अभ्यास से उसे सीख लेता है, तब उसे नयी समझ आती है, और समझ के द्वारा उसका स्वभाव भी बदल जाता है. भगवत गीता में, श्री कृष्ण ने 1/ व्यक्ति के चिंतन यात्रा के पड़ाव अर्थात, तात्कालिक धर्म या स्वभाव और २/ उसके अनुसार, ज्ञान अर्थात बुद्धि-योग के दृढ शक्ति से खोज की विधि, ३/ कर्म अर्थात प्रयोग और अनुभव के प्रमाण ... इन तीनो के परस्पर संबंधों पर विवेचना की है. ज्ञान के शोध की यह यात्रा, एक वृक्ष के पत्तो से, शाखा, और अंत में, मूल के तरफ जा रही है, इस लिए ज्ञान, निरंतर सीमित और सम्बेदंशील और शुद्ध होता रहता है.

परिभाषा, भाषा या एक माध्यम है. अलग अलग प्रान्तों में रोटी को अलग नाम से जाना जाता है. रोटी, की परिभाषा, ज्ञान नहीं हो सकता. ज्ञान, परिभाषा या अन्य संकेतों को उनके उपयोगिता के अनुसार नाम दे सकता है. यह तात्कालिक संकेत केवल उन्हें ही समझ में आ सकते हैं, जो रोटी खा चुके हैं. ज्ञान, परिभाषा या संकेतों में बंधने वाली चीज नहीं है. यह निश्चयात्मक शक्ति है.

एक आदमी भारत में रोटी खा रहा था. उसके मित्र में, अमेरिका में जानना चाहा कि रोटी क्या होती है. भारतीय आदमी, रोटी के अनुभव को बता पाने में असमर्थ था. उसने परिभाषा और संकेतों के माध्यम से रोटी बनाने की सामग्री और विधि और चित्र को लिख कर अपने मित्र को भेजा. उसके मित्र ने उस ज्ञान के उपयोग से रोटी के स्वाद को समझने में सफलता पा ली. इसी तरह, भारत में, मारुती कंपनी में, जापानी ज्ञान से और भारत में ही उपलभध सामग्री से, कार बनते हैं. क्या यह सच नहीं है? अर्थात, परिभाषा के द्वारा, ज्ञान को एक जगह से दूसरे जगह ले जाया जा सकता है. यह प्रयोग सिद्ध है.

Science and ConScience are two words. Please give attention of differences and connection between these.

Science or system is endless 'cause and effect cycles'. For example, if there is water accumulated with contaminants, it breeds mosquito's. Mosquito's produce malaria. Malaria causes disease and hospitalization. Similarly, physics and ... See Morechemistry and any other sciences describe various relationship in causes and effects. By acts of research and carefully investigation, those who know this sciences, can stop producing Mosquito's, and save efforts of medical treatment. In other words, sciences are thoughts of visualization of causes and effects and, doing actions that prevent reactions. It applies to physical, logical, psychological, spiritual and all.

Because every effect has a cause, a cause is also an effect of yet another cause. And finally, there is a ROOT CAUSE which at the ed is without Cause. This is seed which has whole world or tree inside it but not gone into a cause and effect. This Root Cause is ConScience. This is special knowledge or knowledge of Root Cause of all causes and effects, and therefore called Vigyaan.

Mansa Anand ज्ञान क्‍या होता है, एक उदारण ओर सुदर माध्‍यम तो चल ही रहा है इसे क्‍यों न अति सुन्‍दर बनाते चले जाए। फेसबुक में मिलना सुन्‍दर संयोग था। यानि अब मिलना खत्‍म .....ऐसा मत करों इसे अभुतपूर्व बना रहेने तक चलता रहने दो। बहने दो आंनद ओर ज्ञान का झरना।
कुछ कहेगे हम भी कुछ सुनेगे उनकी
दोनो ही न रहेगे बन बहती रहेगी खुशबु।
मनसा आनंद मानस

Krishna Gopal कोई भी सम्बन्ध छूट कैसे सकता है. यही तो योग है. यही यज्ञ भी है. योग, खोज पर चल रहे, यात्रियों का एकात्म भाव है. इन यात्रियों का कोई दृष्टिकोण नहीं होता. चलते रहने के कारण, दृष्टिकोण के बदलते ही दृश्य और दृष्टा दोनों ही बदलते जाते हैं. कुछ छूटता है, तो उससे व्यापक चेतना मिलती है. दृष्टा, जिसका कोई एक दृष्टिकोण नहीं होता, वही ज्ञानी है. वह एक स्थान पर बंधा नहीं रहता, और खोज की यात्रा में, उसके दृष्टिकोण और वह स्वयं भी बदलते ही रहते हैं. एक अज्ञानी ही ज्ञान का अहंकार रख सकता है. ज्ञानी सब लोगों के दृष्टिकोण से देखता है, इस लिए वह दुविधा और व्यक्तित्व की सीमा से जाना भी नहीं जा सकता. उसके लिखे लेख, विचार, दृष्टिकोण पर आधारित है, इसलिए, अलग अलग होते हैं, किन्तु वह एक ही है. श्री कृष्ण ने इस अवस्था को संवाद कहा है. संवाद, योग की क्रिया है, जो दृष्टिकोण की व्यापकता और स्वभाव में ज्ञान द्वारा शुद्धता की विधि भी है. आप के साथ यह संवाद ही है.

जो पहिले, अंग्रेजी में लिखा था उसका सरल अनुवाद करने का प्रयत्नं करता हूँ . ज्ञान या खोज की विधि को मैं साइंस या सिस्टम भी कहता हूँ. संस्कृत में, साइंस को शास्त्र भी कहते हैं. जैसे इकोनोमिक सिस्टम या अर्थ शात्र या भौतिक शास्त्र या फिसिकल सिस्टम. सिस्टम या साइंस या शास्त्र ... ये सभी, क्रिया और प्रतिक्रिया के निरंतर चक्र को संकेत या परिभाषा के विभिन्न माध्यम से जान ने की सुलभ व्यवस्था हैं, और, इस खोज से निरंतर इनकी संख्या बढती ही रहती है. शास्त्र या सिस्टम का यह ज्ञान किसी धटना के पूर्व अनुमान और उसके बचाव में सहयोगी होते हैं. उदहारण के लिए, सोलर सिस्टम पर आधारित व्यवस्था से मौसम का या सूर्या ग्रहण का पूर्वानुमान होता है.

लेकिन, क्रिया और प्रतिक्रिया के चक्र को समझने से यह पता चलता है, की हर प्रतिक्रिया किसी क्रिया का फल है. और वह क्रिया भी किसी अन्य क्रिया की प्रतिक्रिया है. अतः, कोई वह क्रिया भी होगी, जो मूल है, और जो किसी क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं है. यह ज्ञान विज्ञान है. विज्ञान को मै कोन-साइंस कहता हूँ. यह शुद्ध होने से कम होता जाता है, क्योंकि यह मूल की तरफ की दिशा में है. जबकि सांसारिक ज्ञान जो क्रिया-प्रतिक्रिया पर आधारित है, वह बढती ही रहता है यह रहस्य, पहली बार जान कर अजीब लगता है, किन्तु एक बार समझ लेने पर, ज्ञान और विज्ञान के अर्थ में द्वन्द नहीं हो सकता.

धारणा (पॉइंट ऑफ़ विव ) जो देखने वाले या दृष्टा के सोच की वर्तमान स्थिति है. ध्यान (चिंतन) व्यक्ति के विचार क्षेत्र या दृश्य का विशेष चुनाव है. साधन, वे संकेत और परिभाषा के माध्यम हैं जो यह बताते हैं कि इस विचार को हम से पहिले किसने जाना, और जो यहाँ पहिले से गुजर चुका है. जो व्यक्ति साधन को श्रद्धा से ग्रहण कर लेते हैं, उनको इष्ट या गुरु कि प्राप्ति, उसी साधन से हो जाती है. इसे, साधन को शास्त्र या सिस्टम भी कहते हैं. साधना, ध्यान और साधन के उपयोग को कहते हैं. इस से व्यक्ति, खोज कि विधि और इष्ट कि कृपा दोनों ही प्राप्त करता है. तदुपरांत, व्यक्ति, सिद्ध हो जाता है, अर्थात या साधन साधना और ध्यान इन तीनो को समझ लेता है. साधन एक घोड़े की तरह है, ध्यान यात्रा की दिशा, और साधना घोड़े पर सवारी करने जैसा है. सत्य या अनंत स्वयं को, इस प्रकृति के गुणों से निर्गुण कर लेने पर, व्यक्ति जिस स्थित में होता है, वह समाधि है.

ज्ञान क़ी प्राप्ति ध्यान और निर्भीक स्वत्रंत्रता से प्रेरित होती है. अनुभव और तर्क उसके प्रमाण हैं, विश्वास और निश्चिंतता उसका स्वाद है. साधन या शास्त्र या परिभाषा/ संकेत उसके माध्यम हैं. इष्ट या भगवन क़ी भक्ति की ऊँगली को पकड़ना ही उसका बल है, और यह ऊँगली छूट जाय तो जैसे एक बच्चा जो अपने बाबा के साथ बाज़ार देखने गया हो, और ऊँगली छूटने से वह बाज़ार में खो जाता है, वैसे ही साधक भी रोता ही रहेगा.



आयुर्वेद में, ज्योतिष, स्वास्थ्य और चिकित्सा जुड़े हुए शब्द हैं. जीवन का विज्ञान ही आयुर्वेद है. ज्योतिष का अर्थ है, गंतव्य का ज्ञान. अर्थात जीवन में व्यक्ति का स्वभाव, उसके जन्म से मृत्यु तक कितना और किस तरह और किस विधि परिवर्तित होगा. ग्रह इसके साक्षी है, जो समय की गड़ना के लिए धडी की तरह एक माध्यम हैं. यदि अलबर्ट आइस्ताइन एक बैंक में कार्य करते तो वह, उनके गंतव्य को न ले जाता. शरीर एक साधन या कार है, और मन उसका साधक, या ड्राइवर . ड्राइवर को जब अपने गंतव्य का ज्ञान न होगा, तब वह कहाँ जा सकता है. यही ज्ञान ही ज्योतिष है. स्वास्थ्य, गाड़ी चलाने या गाड़ी में स्थिर बैठ कर या स्वयं या मन या ड्राइवर को स्थिर करने की क्रिया है, यदि ड्राइवर, स्थिर नहीं रहेगा तो, गाड़ी चला पाना मुश्किल होगा. चिकित्सा, आपातकालीन दुर्घटना की व्यवस्था है, जो तभी होती है, जब मन या ड्राइवर को न तो गंतव्य का पता हो, और न ही गाड़ी में स्थिर रहना ही. मृत्यु ही वह अंतिम दवा है, जब व्यक्ति को नव जीवन मिलना आवशक हो, और चिकत्सा, असफल हो जाय. मुझे, आपके ज्योतिष के लेख पर यह परामर्श देना उचित लगा.

ज्योतिष एक शास्त्र है, इसलिए यह पूर्वानुमान का एक साधन भी है यह शास्त्र समय का साइंस या सिसटम है, और जो समय के तत्त्व को जानता है, ज्योतिष उसको ही प्राप्त है. समय क्या है, इसको भगवत गीता ने स्पष्ट किया है. और यह समय युग क्यों कहलाता है, और योग से युग कैसे बन सकता है.

भगवत गीता की पवित्र आग ने मुझे श्रद्धा, भक्ति, प्रश्न, तर्क और तकनीक के द्वारा जला डाला है, मेरे अन्दर का अज्ञान जब जलता है, तब बहुत शांति मिलती है. इसे आप आनंद भी कह सकते हैं. संख्या और तकनीक ने मेरी बुद्धि में तेल और घी का कार्य किया, इसलिए, भगवत गीता को मुझे जलाने में जो प्रकाश निकला वह, बहुत तापमान का है. आम व्यक्ति, इन लेखों को नहीं पढना चाहता क्योंकि ये भंग्वत गीता इंजीनियरिंग की तरह क्लिष्ट हो सकते हैं, साहित्य की तरह मृदु नहीं.

Thursday, 8 April 2010

Bhagwat Giita 8.1, 8.3, 8.4


८.१
किं तद ब्रह्म किम अध्यात्मं, किं कर्म पुरुषोत्तम |
अधिभूतं च किम प्रोक्तं अधिदैवं किम उच्यते ||

हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण वह जिसे आप ब्रह्म कहते हैं, वह क्या है. अध्यात्म क्या है और कर्म क्या है.
अधि अर्थात प्रवेश या मुक्ति का मार्ग. अर्थात आत्मा में जाने वाले प्रवेश मार्ग को अधि + आत्म या अध्यात्म भी कहते हैं. इसी तरह, भूत या सांसारिक व्यक्तित्व की प्राप्ति ही अधिभूत ( अधि भूत या भूत या व्यक्तित्व में जाने वाला प्रवेश) कहलाता है, और देवता बनने का मार्ग ही अधिदैव (अधि दैव) है.
हे श्री कृष्ण, आप किसे अधिभूत कहते हैं, और अधिदैव का उच्चारण अर्थात आप के इस शब्द का अर्थ क्या है.

८.३
अक्षरम ब्रह्म परमम् ... स्वभावो अध्यात्म उच्यते |
भूत भावो उद्भव करो .. विसर्गः कर्म संजितः ||
८.४
अधि भूतः क्षरो भावः, पुरुषश्च अधिदैवतं |
अधि यज्ञो अहम् वाटर, देहे देह्भ्रितम वरं||


जन्म और मरण से मुक्त उस अविनाशी मूल प्रकृति और उस निष्चल, दृढ निश्चय और संतुष्ट मूल प्रकृति को अनुभव से जान लिए गए ज्ञान को सत्य ही ब्रह्म कहते हैं. वह सत्य है और वह सद्दैव ही हर प्राणी की चेतना में स्थित रहने वाला है. अकेले रहने पर या ध्यान में, या प्रेम में, वही ब्रह्म अन्दर से बैठा हुआ बातें करता है और निर्भीक चेष्टा करता है. सभी प्राणी, ब्रह्म के ही प्रमाण हैं .

स्वभाव अर्थात स्व (अपनी इच्छा ) और भाव (लेन देन ) को ही अध्यात्म कहते हैं. बिना किसी अपेक्षा के, जो कार्य स्वान्तः सुखाय हो, वही अपनी इच्छा है. अर्थात उस कार्य से परम-आनंद मिलता है, और उस अनंत की प्राप्ति का लेन देन का कोई गणित नहीं किया जाता. स्वभाव या स्वधर्म को जानने की विधि ही अध्यात्म है. तुलसीदास, कबीर, गाँधी, आइन्स्तैन का स्वभाव इसका प्रमाण है.

कर्म किसी अपेक्षा के कारण और लेन देन से ही होता है, इसलिए यह स्व भाव नहीं है. इसे भाव से उत्पन्न हुआ जान ले. लेन-देन के इस दिखावे को ही संसार कहते हैं. यह दिखावा बढ़ता ही जायेगा, क्योंकि इस खेल में लोगों के अलग अलग व्यक्तित्व होते हैं, और कोई भी अपने को पहिचान नहीं पा रहा है, जबकि प्रारब्ध के कारण कर्म का भाव तो रहता है, किन्तु यह नहीं जान पाते कि परस्पर इस बंधन का क्या कारण हो सकता है. स्वभाव में स्व के नष्ट होने से सिर्फ भाव ही बचता है, और यदि स्वभाव को प्राप्त न किया जाय तो यही कर्म, व्यवसाय या कर्म बंधन बन जाता है.

देवता उस स्थिति को कहते हैं, जो स्वभाव में पूर्ण है, अध्यात्म के उदाहरण, और कर्म से पूर्णतः मुक्त है. किन्तु स्वभाव के कारण, अनवरत निष्काम कर्म करते रहते हैं. प्रकृति के नियम ही अप्रत्यक्ष देवता हैं, और सूर्य, पृथ्वी, जल आदि प्रत्यक्ष देवता हैं. वैज्ञानिक, या संत जब प्रकृति के उन अविनाशी किन्तु अप्रत्यक्ष नियमो को खोजता है, तब उस कार्य को देवता की आराधना कहते हैं. देवता ही अधिदैव है. उन्हें ही पुरुष कहते हैं. इनका काम स्वतंत्र किन्तु किसी की अपेक्षा पर निर्भर नहीं होता. आग से भयंकर दुर्धटना हो सकती है, किन्तु आग अपना स्वभाव नहीं बदल सकता. देवता, स्वभाव में ही स्थिर होते हैं. जो व्यक्ति अपने स्वभाव को जान ते हैं, वे देवता की तरह बिना किसी अपेक्षा, भय या अन्य कारण के स्वतः अपना कार्य करते रहते हैं.

यज्ञ, योग की क्रिया है. यह क्रिया हर प्राणी के ह्रदय में स्थित परब्रह्म श्री कृष्ण स्वयं ही करते हैं. स्व-भाव में से भाव की समाप्ति कर केवल स्व अर्थात आत्म या ब्रह्म में परिवर्तन की विधि यज्ञ है. स्वभाव, दो शब्द 'स्व' और 'भाव' से मिल कर बना है. यज्ञ के द्वारा भक्ति और इस भक्ति से हुए शुद्ध स्व या ब्रह्म या सत्य की प्राप्ति होती है, और इस तरह लगातार होते हुए यज्ञ द्वारा स्व-भाव में से उतरोत्तर भाव घटता है. ऋषि बाल्मीकि, एक डाकू थे किन्तु उनका स्वभाव परिवर्तित हो गया और वे ब्रह्म लीन संत हो गए. श्री कृष्ण की कृपा से यज्ञ यही है. ज्ञान, इस यज्ञ में पवित्र अग्नि देवता अर्थात अध्यात्म या स्वभाव की स्थिरता है, और होत्र या समिधा ही व्यक्तित्व, अज्ञान या, गुणों से बना सांसारिक परिचय जिसे भूत भी कहते हैं, है.

Wednesday, 16 September 2009

१६ सितम्बर २००९ >> इच्छा (इष्ट) - अपेक्षा (अनिष्ट) - उदासीन (वशिष्ट)


अनपेक्षः शुचिर दक्षः उदासीनो गतव्यथः |
सर्व आरंभ परित्त्यागी, यो मद भक्तः, स मे प्रियः ||


इच्छा, जीवन का कारण है, और अपेक्षा मृत्यु का. इच्छा का बिना अपेक्षा के होना श्रेयस्कर है. एक आर्त (बीमार, असंतुष्ट, या दरिद्र) व्यक्ति की चेष्टा उसकी इच्छा के बिना संभव नहीं हो सकती. इसी तरह, एक चिकित्सक की अपनी इच्छा उसे दया, सलाह और औषधि के लिए विवश कर सकती है. इस तरह स्वतंत्र इच्छा-शक्ति, के मूल में श्रृद्धा और विश्वास स्थित होता है जो जीवन का एक मात्र आधार है. जबकि अपेक्षा एक व्यावसायिक (विषय युक्त) बंधन है, जो नियंत्रण पर आधारित होता है, और जिससे विश्वास का ह्रास होता है. अर्थात, विश्वास और अपेक्षा अलग अलग अर्थ रखते हैं. जिन पर विश्वास किया जा सकता है, उनसे अपेक्षा नहीं हो सकती. और जिनसे अपेक्षा होती है, उन पर विश्वास नहीं हो सकता.

हर इच्छा सृष्टि बन कर, युग युग (जन्म-जन्म) में पूरी हो जाती है और इस तरह मोक्ष की दूरी बढ़ती रहती है. केवल इस कारण इच्छा का चुनाव करना ही ज्ञान की परीक्षा है. परमात्मा जो सभी प्राणी के अंदर है, उसे अनुभव होता है, कि वरदान देना बहुत आसान है, क्योंकि यह स्वाभाविक है किन्तु वरदान माँगना कठिन है. व्यक्ति को यदि इच्छा पूर्ति की प्रकृति पर विश्वास हो जाय तो वह बहुत सारी इच्छा को स्वयं ही काट-काट कर, केवल वही चाहेगा जिसकी प्राप्ति के बाद उसे अन्य इच्छा न हो या उन इच्छाओं से कोई अपेक्षा न पैदा हो. इच्छाओं के अन्वेषण की क्रिया ही प्रार्थना है और वह सर्वोच्च इच्छा ही इष्ट कहलाती है.

वशिष्ट उसे कहते है जो यह जानता है, कि इच्छा ही कर्म और शुभ या अशुभ कर्म फल का कारण है. निष्काम कर्म (या बिन अपेक्षा के ) की अवस्था ही वशिष्ट है. सभी इच्छाएं उसके वश में हैं इस लिए उसे फल की उत्सुकता या अपेक्षा नहीं होती. इस स्थिति को उदासीन कहते हैं. इस स्थिति में क्रिया और इष्ट दोनों निर्द्वंद होते हैं और कोई व्यथा या कष्ट नहीं होता. वह कोई भी कार्य आरम्भ नहीं करता किन्तु जब किसी की इच्छा उसे दिखती है, तो वह अपनी इच्छा मात्र से उसे सफल बना देता है. परस्पर मन का यह योग किसी अपेक्षा से नहीं बंधता और यही मन या पुरुष या स्वभाव ही अध्यात्म कह लाता है. यही भक्ति और प्रेम है.

Saturday, 12 September 2009

सूर्यवार १२ सितम्बर २००९ युग, समय, दिन - रात्रि, काल (मृत्यु) का तत्व


युग, समय का तत्त्व है. युग का सामान्य अर्थ है जुड़ना. जो तभी संभव है जब दो अलग अलग दृश्य एक हो जायं.
समय, किन्ही भी दो घटनाओं के बीच की दूरी है. उदाहरण के लिए, "राम ने पेन्सिल खो दी" एक घटना है, और "राम ने पेन्सिल वापस पा ली", यह दूसरी धटना है. इन दोनों घटनाओं के बीच की दूरी, १ मिनट, या १ दिन या कभी नहीं, या समय की कोई मात्रा, हो सकती है. यह दूरी (या समय ) तब तक अनिश्चित है जब तक पेन्सिल दुबारा प्राप्त ( युग) नहीं होती. इस तरह, एक युग, १ मिनट, १ दिन या अनंत के बराबर है. इस उदाहरण का अर्थ है कि युग, सदैव दो घटनाओं के मिलने से ही बनता है.

समय, यद्यपि नापा तो जा सकता है किंतु पेन्सिल का मिलना (या युग), उस समय के नाप पर निर्भर नहीं है. ग्रहों की गति या घडी के सुइयों की गति समय के नाप के विभिन्न यन्त्र हैं किन्तु ये युग की परिभाषा नहीं बनाते. यह नहीं हो सकता कि हम घडी देखते रहें और एक निश्चित समय पर खोई हुयी पेन्सिल अपने आप मिल जाये. इसी तरह, सत युग, द्वापर, त्रेता, और कल युग, का कोई पहिले से तय कोई नाप नहीं होता. यह कभी नहीं कहा जा सकता, कि सत युग कितने वर्ष का होता है, या द्वापर की अवधि कितनी और किसने निश्चित की है?

वर्ष, ज्योतिष या ग्रहों की गति की गणना करने से युग के आने का इन्तजार कभी सफल नहीं हो सकता. गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित मानस में यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य के मन में चारों युग हमेशा ही बसते है. मन में सत गुण के उदय होने पर प्रसन्नता होती है, और वह स्थिति ही सत युग है. मन में तम गुण के प्रवेश होते ही निराशा या अन्धकार हो जाता है, और चारों ओर विरोध ही विरोध दिखता है, जो कल युग है.

ज्ञान के प्रकाश द्वारा काल का विक्रम
समय परिवर्तन या बदलाव का सूचक है. इस लिए, इसे क्रम भी कहते हैं. पेन्सिल के खोने की धटना के बाद ही पेन्सिल के पाने की घटना हो सकती है. इसलिए, समय, एक क्रम के आधीन होता है. जो भी इस क्रम का व्यतिक्रम कर जाता है, या उसे लाँघ कर पार कर लेता हैं, उसे ही विक्रम कहते हैं. उदाहरण के लिए १,2,3,4,5,6, .... क्रम है, किन्तु १,१० ,२० ,३० ..... या १,१०० ,२०० ,३०० .... विक्रम (वि +क्रम ) हैं. एक पैदल यात्री का हर कदम क्रम से ही चलता है, किन्तु सूर्य, पक्षी या हवाई जहाज उस दूरी को लाँघ कर शीघ्र पार कर लेते है. विक्रमादित्य का अर्थ, सूर्य का वह गुण है जो लाँघ लाँघ कर, समय की दूरी को कम कर देता है.



सहस्त्र युग पर्यंत मह्र्यद ब्रह्मणो विदुः | ८.१७

श्री कृष्ण इस बात को कहते हैं कि ब्राह्मण अर्थात जो ज्ञानी है, उसके लिए समय की मात्रा और अन्य लोगों की समय की मात्रा अलग अलग होगी. क्योंकि ब्राह्मण का एक दिन अन्य लोगों के सहस्त्र युगों के बराबर होता है. अर्थात जो यह जाता है कि पेन्सिल कहाँ खोई है, उसे ढूँढने में कम समय लगेगा, किन्तु जो अन्धकार में हैं, या वे पेन्सिल खोने के स्थान को नहीं जानते, वे उस खोई पेन्सिल को न जाने कब तक प्राप्त करेंगे.

रात्रिम युग सहस्त्रन्ताम; ते, होरा अत्र विदो जनाः || ८.१७

अर्थात ज्ञान का होना ही समय की मात्रा को कम कर सकता है और इस तरह, विक्रम या जो समय (होरा, hour) को लाँघने की विधि को जानता है, ब्राह्मण है. श्री कृष्ण के अनुसार, ब्राह्मण, काल या समय से बंधा नहीं होता, क्योंकि उसके लिए कोई कार्य अपूर्ण नहीं है, अपूर्णता, अपेक्षा या खोज की अनिश्चित स्थिति ही काल है. वह सदैव संतुष्ट व्यक्ति ही योगी है. और अंतहीन प्रतिक्रिया में समय का नाप लेते रहने और, उसे व्यतीत होते रहने किन्तु, युग के पूर्ण न होने को ही रात्रि कहते हैं.


आत्म ज्ञान और जन्म-मृत्यु
घटना क्या है? पेन्सिल का खोना और मिलना धटना क्यों हैं? श्री कृष्ण कहते हैं कि धटना अनंत संभावनाओं में से एक सम्भावना है. बालू के दो ढेर में से एक ढेर में से एक कण का दूसरे ढेर के एक कण से मिलान होने की सम्भावना ही युग है. योग्यता के अनुसार हर व्यक्ति के लिए युग का अनुभव अलग अलग होगा. पेन्सिल का अस्तित्व सदैव है किन्तु उसका न दिखना ही पेन्सिल का खोना है. और पेन्सिल का प्राप्त होना उसका पुनः देखा जाना है.


अव्यक्त| व्यक्त यः सर्वाः प्रभाव अन्त, हर आगमे |
रात्र्या आगमे प्रलीयन्ते, तत्र एव व्यक्त संज्ञके || ८.१८


किसी दृष्टा का अव्यक्त और व्यक्त दोनों को एक जानने की विधि ही ब्रह्म है. अव्यक्त ही ज्ञान के प्रकाश में व्यक्त या दिखने लगता है, और व्यक्त पुनः रात्रि के आगमन होने पर अव्यक्त हो जाता है. श्री कृष्ण ने यह कहा है कि योगी अव्यक्त को जानता है, इसलिए अन्य लोगों की रात्रि उनके लिए दिन के प्रकाश जैसा है. और देखे गए भ्रम से बनी सृष्टि उनके लिए रात्रि है. यह मन (स्वभाव) और बुद्धि (स्मृति) पर, प्रकृति के प्रभाव हैं. प्रकाश के न रहने को रात्रि और प्रकाश के रहने को दिन कहते हैं. पेन्सिल और पेन्सिल को खोने और पाने वाला, प्रकृति के प्रभाव से ही परिभाषित हैं. धटना का निर्धारण पेन्सिल नहीं करती, वह दृष्टा और उसके ज्ञान के प्रकाश पर निर्भर है. अर्थात, काल या समय या घटना, दृष्टा या जीव की ही रचना है.

भूत ग्रामः स एवा यं, भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्रि आगमे, अवशः पार्थ; प्रभाव अन्त, हर आगमे || ८.१९


मृत्यु, दृष्टा की नहीं होती बल्कि उन घटनाओं या काल की होती है. कुछ न कुछ, बार-बार, व्यक्त और अव्यक्त तो होता ही रहता है. ज्ञान के अभाव या रात्रि में, प्राणी अवश (या होश में नहीं रहता) कितु ज्ञान होने पर, या दिन के आगमन होने पर, अज्ञान का वह प्रभाव नहीं होता. दृष्टा के लिए सारी सृष्टि का अव्यक्त हो जाना ही सृष्टि की मृत्यु है, और पुनः आत्मा के प्रकाश में उसके द्वारा ही नए सृष्टि की रचना होती है.



बहुत लोग सोचते हैं आँखे देखती हैं, किन्तु कुछ लोग देखने के लिए प्रकाश को कारण मानते हैं. दृष्टा तो अँधेरे में भी बुद्धि, तर्क या स्मृति के प्रकाश द्वारा देखता है और संसार से विमुख हो कर अवचेतन निद्रा में स्वप्न की स्थिति, और समाधि की चिर-निद्रा में अध्यात्म का दर्शन करता है. अर्थात दृष्टा, आँखों (इन्द्रियों और मन सहित) व प्रकाश (भौतिक प्रकाश और आध्यात्मिक संवेदनशीलता) दोनों का ही नियंता है. अर्थात दृष्टा का ज्ञान ही प्रकाश है, जिसकी मृत्यु नहीं हो सकती और वह उस अकाल तत्व 'सत्य' को जान गया है. "सत श्री अकाल, बोले सो निहाल " गुरु नानक ने सत को अकाल कहा है.

संतुष्ट रहना तभी संभव है जब काल का प्रभाव न हो. अर्थात, दृष्टा को सृष्टि में हो रही व्यक्त -अव्यक्त घटनाओं से कोई अपेक्षा न हो. वह युग के अन्दर न रहे, अर्थात दो घटनाओं के बीच अपेक्षा की स्थिति (काल) में न रहे. उसे युग-पर्यंत या युग के बाहर रहना चाहिए. व्यक्ति के सफलता के लिए उसे वह कार्य करना चाहिए जो उसे करना है, न कि मजबूरी या लालच या भय के वश. इस तरह व्यक्ति, काल या व्यक्त सृष्टि की मृत्यु से नहीं घबराता. इन योगी पुरुषों को युग पुरुष या युग परिवर्तक भी कहते हैं. राम, कृष्ण, बुद्ध ने युग परिवर्तन कर दिखाया .

आइंस्टाइन ने भौतिक समय की खोज में सारा जीवन लगा दिया. उनका ध्यान, दृष्टा और ज्ञान के प्रकाश में मन वांछित संतुष्टि की खोज न थी. उन्होंने गणित या सांख्य योग के द्वारा सृष्टि के भौतिक नियमो की खोज कर उन्होंने यह पाया कि समय सापेक्ष है. वे सृष्टि के मूल आधार का पता न लगा सके. प्रकाश की गति भौतिक सृष्टि में अधिकतम सीमा है. जो लोंग देख नहीं सकते उनकी सृष्टि की सीमा ध्वनि की गति पर निर्भर है, जो प्रकाश की गति से देखे जाने वाले सृष्टि से छोटी होगी. यदि प्रकाश की गति दुगुना हो जाय या हमारी आँखे दुगुनी शक्ति से (टेलिस्कोप से ) देखें तो दूर की वस्तु नजदीक दिखेंगी. इस उदाहरण का अर्थ सिर्फ इतना है कि प्रकृति में क्या दिखता है, या देखा जाना है, उसका आधार दृष्टा और आत्मा का अक्षर प्रकाश है. ध्यान की विधि, मन को टेलिस्कोप बना देती है. इस से काल की रात्रि या (प्रकाश की गति से सीमित) समय की गणना के दूर साफ साफ देखा जा सकता है.


Tuesday, 7 July 2009

४ जुलाई २००९ शनिवार


८.१ अर्जुन उवाच
अधि भूतं च किं प्रोक्तम, अधि दैवं किं उच्च्यते ?
हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण,"अधि भूत" किसे कहते हैं, और आपने "अधि दैव" किसे कहा है?

८.२ अर्जुन उवाच
अधि यज्ञः कथं को अत्र देहे अस्मिन मधु सूदन
प्रयाण काले च कथं ज्ञयो असि नियतात्म भिः

हे मधु-सूदन श्री कृष्ण, आप के द्वारा जिसे "अधि यज्ञ" कहा गया है, जो इस देह में सदैव होता रहता है, वह क्या है? और इस देह धारण के काल की समाप्ति पर ज्ञात होने वाले, अर्थात आत्म ज्ञान में स्थिर होने की दशा क्या है?

८.४ श्री भगवन उवाच
"अधि भूतं" क्षरो भावः, पुरुष श्च "अधि दैव" तं
"अधि यज्ञ" अहम् वा अत्र देहे, देह भृताम वर


श्री कृष्ण उत्तर में कहते हैं, कि देह धारियों में श्रेष्ठ हे अर्जुन, भाव (भौतिक या सांसारिक प्रभाव) अर्थात प्रतिक्रियात्मक या सक्रिय तत्व जो स्वभाव नहीं है, उसका क्षय या कम होना ही "अधि भूत" है. इसका अर्थ है कि कर्म, (स्वभाव से या) मौलिक होना चाहिए, भाव से (मजबूरी, दिखावा, अंहकार, या भय या किसी अपेक्षा के कारण) नहीं. इसका अर्थ यह भी है कि (बौद्धिक) कर्म से (मन का) स्वभाव कभी नष्ट न हो. स्वान्तः सुखाय निष्काम कर्म उसका एक उदाहरण है. स्वभाव की रक्षा कर पाना ही वीरता है. अर्थात जो सही गलत को निष्पक्ष जानता है, दृढ निश्चयी है, वही वीर है.

मन की शुद्धता अर्थात निर्मल पुरुष ही "अधि दैव" है. मन की शुद्धता, आत्म ज्ञान में प्रवृत्ति, भगवत भक्ति, और सांसारिक तत्वों के मूल कारण को जान लेने के संतोष से मिलती है. एक बार मन जब साफ़ होने लगता है, तो वह दुबारा सांसारिक गंदगी में नहीं जाना चाहता. उसकी इच्छाएं अपने आप शांत होने लगती हैं और देवताओं के सहयोग से वह इसमें सफल भी हो जाता है.

हे देह धारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, मेरे अतिरिक्त "अधि यज्ञ" कौन है? अर्थात इस देह में "अधि यज्ञ" मैं (परमात्मा का स्वरुप) हूँ. देह की समाप्ति केवल एक जीवन या अनगिनित जीवन-मृत्यु की बात नहीं है, जब जब, प्राणी की चेतना या मन, पुनः देह धारण करता रहता है, उसे अपने मन में आत्म-ज्ञान का अनुभव नहीं होता. और, जब उसका ध्यान, इस ओर जाता है, उसका देह त्याग या प्रयाण या मोक्ष सफल हो जाता है.

Tuesday, 23 June 2009

23 जून २००९ मंगलवार

शिशु पार्थ के साथ उनके वृद्ध पितामह कृष्ण गोपाल मिश्र

८.१ अर्जुन उवाच
किं तद ब्रह्म, किं अध्यात्मं, किं कर्म, पुरुषोत्तम ?
हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण, वह जिसे आप ने ब्रह्म कहा है वह क्या है? अध्यात्म क्या है, और कर्म क्या है?
८.३ श्री भगवान उवाच
अक्षर ब्रह्म परमं, स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः


अक्षर ब्रह्म परमं
जिसका नाश कभी नहीं होता, उसे ही ब्रह्म कहते हैं. उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक भी अब जान गए हैं कि प्रकृति की सभी शक्तियां और ज्ञान जो सभी वस्तुओं और जीव में निहित हैं वे ब्रह्म ही हैं क्योंकि उनका एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तन तो होता है. किन्तु नाश कभी नहीं होता. जो तत्व ज्ञानी, श्री कृष्ण द्वारा दी गयी ब्रह्म की इस परिभाषा को जान लेते हैं, वे ब्रह्म को समस्त विश्व में हर जगह और हमेशा देखते हैं.
स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
स्वभाव ( स्व अर्थात मौलिक और भाव अर्थात गुण) अर्थात मनुष्य का (सहज या निर्मल) स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है. अध्यात्म का मौलिक होना यह सिद्ध करता है कि यह बाहर से सीखा नहीं जा सकता, जो भय या प्रतिक्रिया या अपेक्षा से रहित है, और उसका प्रमाण वह स्वयं है. नवजात शिशु का स्वभाव, अध्यात्म का प्रत्यक्ष दर्शन है.
भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः
भाव, जो स्व+भाव नहीं है, और जो सीखा जा सकता है, प्रमाण द्वारा, तर्क से सिद्ध है, और प्रतिक्रिया या एक दूसरे की अपेक्षा के लिए होता है, उससे ही भौतिक संसार की सृष्टि होती है. इस प्रतिक्रिया में लगने वाले भाव जिस से सृष्टि का उदभव होता है,वही कर्म है.

अध्यात्म (अर्थात "स्व+भाव" ) में कर्म फल की अपेक्षा नहीं होती क्योंकि वह मौलिक या स्वयं से ही उद्भूत है जबकि "भूत + भाव " (अर्थात भौतिक या सांसारिक ज्ञान), कारण और फल (cause and effect) से बंधा है. संत तुलसी दास ने इसे इस तरह लिखा "करम प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करै, सो तस फल चाखा".

विश्व या संसार, एक रचित या प्रतिक्रिया से निर्मित कर्म-क्षेत्र है, इस युद्ध को ज्ञान और भगवत कृपा से विजय करने के उपरांत ही, अध्यात्म प्राप्त होता है. अर्थात, आत्मा में प्रवेश के लिए मन के द्वार एक एक कर खुलने लगते हैं. कर्म के फल शुभ और अशुभ दोनों ही हो सकते हैं,जिस पर उसका अधिकार नहीं होता, और भौतिक शास्त्र के प्रभाव और परिस्थितियां उसको करने के लिए विवश करती है. इस लिए कर्म फल के त्याग से ही, मनुष्य, कारण रूपी मन, और स्वभाव को जानने का प्रत्न कर सकता है.

Sunday, 17 May 2009

१७ मई 2009

पिता -पुत्र (प्रभात - पार्थ )
६. ४६ श्री भगवान उवाच
तपस्विभ्यो अधिको योगी ज्ञानि भ्योपि मतो अधिकः
कर्मभ्य्श्च अधिको योगी तस्माद योगी भवार्जुन


निर्गुण पुत्र का माँ या पिता के मन के गोद में रहना ही योग है.चाहे वे कहीं भी रहें. योग का सम्बन्ध निर्गुण है. योगी, प्रेम या योग का स्वतः पात्र है, उसे कुछ भी करना शेष नहीं होता. न तप, न ज्ञान, न कर्म. परम पिता श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन तुम मेरे पास सिर्फ रहो. उपासना (उप +आसन या मन के समीप रहना ) ही पर्याप्त है. मेरे प्रेम का पात्र बनने की और कोई योग्यता नहीं है. तुम्हारे ऊपर के प्रकृति के सभी प्रभाव या संसार के गुण मैं धो दूंगा, इसलिए तुम मुझे गंदे भी प्रिय हो. योग का यह निर्गुण तत्त्व, तुम्हारे मन और बुद्धि से परे है. मेरा यह मत सिद्ध है.


माँ - पुत्र (वर्तिका - पार्थ)
योगी को न तो तप, न ही ज्ञान, न ही कर्म छू सकता है. ये प्रकृति के तीन गुंणों से निवृत्ति के ही मार्ग हैं. योगी बिना किसी प्रयत्न के ही संतुष्ट है इस लिए हे अर्जुन योगी बन. माँ की तरह श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं मैं तो हूँ न तुम्हारे ऊपर प्रकृति या संसार के प्रभाव को धोने और तुम्हे शुद्ध करने के लिए ? उपासक बन, तुम कुछ और मत कर. इस निर्गुण (निर्लिप्त) अवस्था में तुम मुझे गंदे ही सबसे अच्छे लगते हो.

Yogi is superior to tapah (non reaction or prudential endurace) as well as the zyani (act of learning, or on the path of inquiry). Yogi is also superior to the karmi (sincere action but without attachment) and therefore hey Arjun, be Yogi.

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In simple words, I can describe myself as a practitioner of the Bhagwat Gita and studying without destruction, to live; and ability to see the world in its format. When I will ever discover 'who am I', may be then I will let you know. But till that time, I believe 'work' is a means of self expression; and the work itself, in effortless and defenseless condition, is the introduction of true self.