युग, समय का तत्त्व है. युग का सामान्य अर्थ है जुड़ना. जो तभी संभव है जब दो अलग अलग दृश्य एक हो जायं.
समय, किन्ही भी दो घटनाओं के बीच की दूरी है. उदाहरण के लिए, "राम ने पेन्सिल खो दी" एक घटना है, और "राम ने पेन्सिल वापस पा ली", यह दूसरी धटना है. इन दोनों घटनाओं के बीच की दूरी, १ मिनट, या १ दिन या कभी नहीं, या समय की कोई मात्रा, हो सकती है. यह दूरी (या समय ) तब तक अनिश्चित है जब तक पेन्सिल दुबारा प्राप्त ( युग) नहीं होती. इस तरह, एक युग, १ मिनट, १ दिन या अनंत के बराबर है. इस उदाहरण का अर्थ है कि युग, सदैव दो घटनाओं के मिलने से ही बनता है.
समय, यद्यपि नापा तो जा सकता है किंतु पेन्सिल का मिलना (या युग), उस समय के नाप पर निर्भर नहीं है. ग्रहों की गति या घडी के सुइयों की गति समय के नाप के विभिन्न यन्त्र हैं किन्तु ये युग की परिभाषा नहीं बनाते. यह नहीं हो सकता कि हम घडी देखते रहें और एक निश्चित समय पर खोई हुयी पेन्सिल अपने आप मिल जाये. इसी तरह, सत युग, द्वापर, त्रेता, और कल युग, का कोई पहिले से तय कोई नाप नहीं होता. यह कभी नहीं कहा जा सकता, कि सत युग कितने वर्ष का होता है, या द्वापर की अवधि कितनी और किसने निश्चित की है?
वर्ष, ज्योतिष या ग्रहों की गति की गणना करने से युग के आने का इन्तजार कभी सफल नहीं हो सकता. गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित मानस में यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य के मन में चारों युग हमेशा ही बसते है. मन में सत गुण के उदय होने पर प्रसन्नता होती है, और वह स्थिति ही सत युग है. मन में तम गुण के प्रवेश होते ही निराशा या अन्धकार हो जाता है, और चारों ओर विरोध ही विरोध दिखता है, जो कल युग है.
ज्ञान के प्रकाश द्वारा काल का विक्रम
समय परिवर्तन या बदलाव का सूचक है. इस लिए, इसे क्रम भी कहते हैं. पेन्सिल के खोने की धटना के बाद ही पेन्सिल के पाने की घटना हो सकती है. इसलिए, समय, एक क्रम के आधीन होता है. जो भी इस क्रम का व्यतिक्रम कर जाता है, या उसे लाँघ कर पार कर लेता हैं, उसे ही विक्रम कहते हैं. उदाहरण के लिए १,2,3,4,5,6, .... क्रम है, किन्तु १,१० ,२० ,३० ..... या १,१०० ,२०० ,३०० .... विक्रम (वि +क्रम ) हैं. एक पैदल यात्री का हर कदम क्रम से ही चलता है, किन्तु सूर्य, पक्षी या हवाई जहाज उस दूरी को लाँघ कर शीघ्र पार कर लेते है. विक्रमादित्य का अर्थ, सूर्य का वह गुण है जो लाँघ लाँघ कर, समय की दूरी को कम कर देता है.
सहस्त्र युग पर्यंत मह्र्यद ब्रह्मणो विदुः | ८.१७
श्री कृष्ण इस बात को कहते हैं कि ब्राह्मण अर्थात जो ज्ञानी है, उसके लिए समय की मात्रा और अन्य लोगों की समय की मात्रा अलग अलग होगी. क्योंकि ब्राह्मण का एक दिन अन्य लोगों के सहस्त्र युगों के बराबर होता है. अर्थात जो यह जाता है कि पेन्सिल कहाँ खोई है, उसे ढूँढने में कम समय लगेगा, किन्तु जो अन्धकार में हैं, या वे पेन्सिल खोने के स्थान को नहीं जानते, वे उस खोई पेन्सिल को न जाने कब तक प्राप्त करेंगे.
रात्रिम युग सहस्त्रन्ताम; ते, होरा अत्र विदो जनाः || ८.१७
अर्थात ज्ञान का होना ही समय की मात्रा को कम कर सकता है और इस तरह, विक्रम या जो समय (होरा, hour) को लाँघने की विधि को जानता है, ब्राह्मण है. श्री कृष्ण के अनुसार, ब्राह्मण, काल या समय से बंधा नहीं होता, क्योंकि उसके लिए कोई कार्य अपूर्ण नहीं है, अपूर्णता, अपेक्षा या खोज की अनिश्चित स्थिति ही काल है. वह सदैव संतुष्ट व्यक्ति ही योगी है. और अंतहीन प्रतिक्रिया में समय का नाप लेते रहने और, उसे व्यतीत होते रहने किन्तु, युग के पूर्ण न होने को ही रात्रि कहते हैं.
आत्म ज्ञान और जन्म-मृत्यु
घटना क्या है? पेन्सिल का खोना और मिलना धटना क्यों हैं? श्री कृष्ण कहते हैं कि धटना अनंत संभावनाओं में से एक सम्भावना है. बालू के दो ढेर में से एक ढेर में से एक कण का दूसरे ढेर के एक कण से मिलान होने की सम्भावना ही युग है. योग्यता के अनुसार हर व्यक्ति के लिए युग का अनुभव अलग अलग होगा. पेन्सिल का अस्तित्व सदैव है किन्तु उसका न दिखना ही पेन्सिल का खोना है. और पेन्सिल का प्राप्त होना उसका पुनः देखा जाना है.
अव्यक्त| व्यक्त यः सर्वाः प्रभाव अन्त, हर आगमे |
रात्र्या आगमे प्रलीयन्ते, तत्र एव व्यक्त संज्ञके || ८.१८
किसी दृष्टा का अव्यक्त और व्यक्त दोनों को एक जानने की विधि ही ब्रह्म है. अव्यक्त ही ज्ञान के प्रकाश में व्यक्त या दिखने लगता है, और व्यक्त पुनः रात्रि के आगमन होने पर अव्यक्त हो जाता है. श्री कृष्ण ने यह कहा है कि योगी अव्यक्त को जानता है, इसलिए अन्य लोगों की रात्रि उनके लिए दिन के प्रकाश जैसा है. और देखे गए भ्रम से बनी सृष्टि उनके लिए रात्रि है. यह मन (स्वभाव) और बुद्धि (स्मृति) पर, प्रकृति के प्रभाव हैं. प्रकाश के न रहने को रात्रि और प्रकाश के रहने को दिन कहते हैं. पेन्सिल और पेन्सिल को खोने और पाने वाला, प्रकृति के प्रभाव से ही परिभाषित हैं. धटना का निर्धारण पेन्सिल नहीं करती, वह दृष्टा और उसके ज्ञान के प्रकाश पर निर्भर है. अर्थात, काल या समय या घटना, दृष्टा या जीव की ही रचना है.
भूत ग्रामः स एवा यं, भूत्वा भूत्वा प्रलीयते |
रात्रि आगमे, अवशः पार्थ; प्रभाव अन्त, हर आगमे || ८.१९
मृत्यु, दृष्टा की नहीं होती बल्कि उन घटनाओं या काल की होती है. कुछ न कुछ, बार-बार, व्यक्त और अव्यक्त तो होता ही रहता है. ज्ञान के अभाव या रात्रि में, प्राणी अवश (या होश में नहीं रहता) कितु ज्ञान होने पर, या दिन के आगमन होने पर, अज्ञान का वह प्रभाव नहीं होता. दृष्टा के लिए सारी सृष्टि का अव्यक्त हो जाना ही सृष्टि की मृत्यु है, और पुनः आत्मा के प्रकाश में उसके द्वारा ही नए सृष्टि की रचना होती है.
बहुत लोग सोचते हैं आँखे देखती हैं, किन्तु कुछ लोग देखने के लिए प्रकाश को कारण मानते हैं. दृष्टा तो अँधेरे में भी बुद्धि, तर्क या स्मृति के प्रकाश द्वारा देखता है और संसार से विमुख हो कर अवचेतन निद्रा में स्वप्न की स्थिति, और समाधि की चिर-निद्रा में अध्यात्म का दर्शन करता है. अर्थात दृष्टा, आँखों (इन्द्रियों और मन सहित) व प्रकाश (भौतिक प्रकाश और आध्यात्मिक संवेदनशीलता) दोनों का ही नियंता है. अर्थात दृष्टा का ज्ञान ही प्रकाश है, जिसकी मृत्यु नहीं हो सकती और वह उस अकाल तत्व 'सत्य' को जान गया है. "सत श्री अकाल, बोले सो निहाल " गुरु नानक ने सत को अकाल कहा है.
संतुष्ट रहना तभी संभव है जब काल का प्रभाव न हो. अर्थात, दृष्टा को सृष्टि में हो रही व्यक्त -अव्यक्त घटनाओं से कोई अपेक्षा न हो. वह युग के अन्दर न रहे, अर्थात दो घटनाओं के बीच अपेक्षा की स्थिति (काल) में न रहे. उसे युग-पर्यंत या युग के बाहर रहना चाहिए. व्यक्ति के सफलता के लिए उसे वह कार्य करना चाहिए जो उसे करना है, न कि मजबूरी या लालच या भय के वश. इस तरह व्यक्ति, काल या व्यक्त सृष्टि की मृत्यु से नहीं घबराता. इन योगी पुरुषों को युग पुरुष या युग परिवर्तक भी कहते हैं. राम, कृष्ण, बुद्ध ने युग परिवर्तन कर दिखाया .
आइंस्टाइन ने भौतिक समय की खोज में सारा जीवन लगा दिया. उनका ध्यान, दृष्टा और ज्ञान के प्रकाश में मन वांछित संतुष्टि की खोज न थी. उन्होंने गणित या सांख्य योग के द्वारा सृष्टि के भौतिक नियमो की खोज कर उन्होंने यह पाया कि समय सापेक्ष है. वे सृष्टि के मूल आधार का पता न लगा सके. प्रकाश की गति भौतिक सृष्टि में अधिकतम सीमा है. जो लोंग देख नहीं सकते उनकी सृष्टि की सीमा ध्वनि की गति पर निर्भर है, जो प्रकाश की गति से देखे जाने वाले सृष्टि से छोटी होगी. यदि प्रकाश की गति दुगुना हो जाय या हमारी आँखे दुगुनी शक्ति से (टेलिस्कोप से ) देखें तो दूर की वस्तु नजदीक दिखेंगी. इस उदाहरण का अर्थ सिर्फ इतना है कि प्रकृति में क्या दिखता है, या देखा जाना है, उसका आधार दृष्टा और आत्मा का अक्षर प्रकाश है. ध्यान की विधि, मन को टेलिस्कोप बना देती है. इस से काल की रात्रि या (प्रकाश की गति से सीमित) समय की गणना के दूर साफ साफ देखा जा सकता है.
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