१०.९ श्री भगवान् उवाच
मत चित्तः मद गतः प्राणा बोधयन्तः परस्परम
कथयन्तश्च माम नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च
"मत चित्तः" श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि मेरे निर्विकल्प (निश्काम) एक संकल्प द्वारा बनाये गए, चित्र या ड्राइंग से ही सम्पूर्ण विश्व बना है. जबकि मेरे ही अष्टधा प्रकृति (नियम और गुंणों से)के द्वारा निर्मित उस देखे, सुने, स्पर्श, गंध, स्वाद, बुद्धि,अंहकार और मन से जान सकने वाले विश्व में, मैं नहीं हूँ.
"मद गतः प्राणा" तब अर्जुन उस चित्र को देख, विश्व की कल्पना कर ही सहम से गए. यह देख, श्री कृष्ण ने उन्हें आक्सिजन सिलिंडर या उतनी श्वास या प्राण वायु दे दी जो उनके विश्व में रहने की अवधि तक के लिए चाहिए.
"बोधयन्तः परस्परम" श्री कृष्ण ने अर्जुन से तब कहा, कि तुम विश्व के अस्तित्व के इस रहस्य को मुझ से समझ लो. इसके लिए तुम इस घनघोर विश्व के अन्दर जा कर मेरे ही ड्राइंग या चित्र से बने, मेरे ही दिए गए सांस को ठीक से लेते हुए (अर्थात जीवित अवस्था में), प्रकृति के भव (मूर्ति मान)सागर को देखो और समझो.
"कथयन्तश्च माम नित्यं" साथ ही तुम्हे,अपने मन के टेलीफोन द्वारा लगातार मुझ से बात करना कभी नहीं भूलना चाहिए.
"तुष्यन्ति च रमन्ति च" और इस तरह तुम विश्व में संतुष्ट रह कर जहाँ चाहो वहां घूमते रहो. हे पार्थ, तुम्हारी यह स्मृति कभी नष्ट न हो. इस तरह तुम इस विश्व को तत्त्व से जान कर, जा कर, वापस आओ.
मत चित्तः Sri Krishna like a typical architect, carries with Him His drawing or picture ( चित्तः , चित्र ) of the entire physical universe; and desired it to explain it to Arjun. Arjun, who never saw such a mind boggling design of the physics (physical reality), was absolutely clueless; and could not even properly breath. He (Arjun), could not even imagine entering the world, of which only the design/drawings or picture are shown. मद गतः प्राणा Sri Krishna then gives गतः Arjun the breath प्राणा so that he remains alive to whatever time he is inside it (the world of which the picture is shown). बोधयन्तः परस्परम After this, Arjun began understanding बोधयन्तः the design of the universe, step by step, very carefully together परस्परम with Sri Krishna.
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